ग्लैंडर्स बीमारी के चलते अश्व प्रजाति के पशुओं के सार्वजनिक उपयोग पर भोपाल में लगा प्रतिबंध अगले महीने (मार्च से) हट सकता है। लगातार तीन महीने तक नया मामला नहीं आने के बाद प्रतिबंध हटाने का नियम है। नया मामला आया या नहीं, यह पता करने के लिए हर महीने अश्व प्रजाति (घोड़े, गधे और खच्चर) के ब्लड के सैंपल लेकर जांच के लिए राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र हिसार भेजे जाते हैं। अगस्त के बाद से यहां ग्लैंडर्स का मामला नहीं आया है। जनवरी और फरवरी में भेजे गए सैंपलों की रिपोर्ट अभी नहीं आई। इनमें ग्लैंडर्स की पुष्टि नहीं हुई तो मार्च में राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित करने के साथ ही प्रतिबंध हटा लिया जाएगा।
भोपाल में पशु चिकित्सा विभाग के उपसंचालक डा. अजय रामटेके ने बताया कि जिस क्षेत्र में प्रभावित पशु मिलता है, वहां से पांच किमी के दायरे में आने वाले सभी, 5 से 10 किमी के दायरे में 20 से 30, और 10 से 15 किमी के दायरे में आने वाले अश्व प्रजाति के लगभग 20 सैंपल लिए जाते हैं। जानवरों से यह बीमारी इंसानों में आ सकती है, इसलिए इनके सार्वजनिक उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जाता है।
बैक्टीरियाजनित बीमारी
ग्लैंडर्स बीमारी बैक्टीरिया से होती है। एक साथ खाने, एक ही बर्तन में पानी पीने, छींकने या खांसने की वजह से यह बीमारी एक से दूसरे पशु में फैलती है। इसकी पुष्टि खून की जांच से होती है। प्रभावित पशुओं में बुखार, नाक बहने, छींक आने के लक्षण् दिखाई देते हैं।
भोपाल में इसलिए ज्यादा आते हैं मामले
पशु चिकित्सा विभाग के अफसरों ने बताया कि भोपाल में आसपास के जिलों के घोड़े भी शादी, परेड और अन्य तरह के कार्यक्रमों में लाए जाते हैं। इनके जरिए यहां के पशुओं में संक्रमण ज्यादा फैलता है। पहली बार मई 2018 में भोपाल में ग्लैंडर्स का मामला सामने आया था। उसके बाद से कई बार संक्रमित मिल चुके हैं।




