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Uniform Civil Code: समान नागरिक संहिता का मामला फिर उठा, सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल

Uniform Civil Code: समान नागरिक संहिता का मामला एक बार फिर गर्मा गया है। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल हुई है, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित समान नागरिक संहिता लागू करने की मांग वाले प्रार्थना पत्र को सुप्रीम कोर्ट स्थानांतरित करने की मांग की गई है। यह याचिका दिल्ली भाजपा की प्रवक्ता निघत अब्बास ने दाखिल की है। यह तीसरी याचिका है, जिसमें समान नागरिक संहिता का मामला दिल्ली हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट स्थानांतरित करने की मांग की गई है। इसके पहले भाजपा नेता अश्वनी उपाध्याय और देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद के पौत्र फिरोज बख्त अहमद ने दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित उनकी ऐसी ही याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग की थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट में 11 फरवरी को सुनवाई होने की संभावना है।

निघत की याचिका में कहा गया है कि अश्वनी उपाध्याय की पांच याचिकाएं पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। इनमें लड़का-लड़की की विवाह की आयु समान करने, विवाह विच्छेद की प्रकिया सभी के लिए समान करने, गुजारा भत्ता के नियम सभी के लिए एक समान बनाने, गोद लेने और भरण पोषण का अधिकार सभी को एक समान देने तथा संपत्ति की विरासत और उत्तराधिकार के नियम सभी के लिए समान करने की मांग शामिल हैं।

कोर्ट इन याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस भी जारी कर चुका है। ऐसे में समान नागरिक संहिता की मांग करने वाली उसकी दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट स्थानांतरित कर दिया जाए, क्योंकि अश्वनी उपाध्याय की याचिकाओं में उठाई गई मांगें समान नागरिक संहिता से संबंधित हैं।

2019 में नोटिस जारी किया था

निघत की याचिका पर हाई कोर्ट ने वर्ष 2019 में नोटिस जारी किया था। सरकार ने समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर हाई कोर्ट में दाखिल जवाब में इस पर गहनता से अध्ययन की जरूरत बताई थी। साथ ही कहा था कि यह मामला विधायिका के विचार योग्य है, इस पर कोर्ट को आदेश नहीं देना चाहिए। सरकार ने मामले को विधि आयोग को भेजे जाने का भी हवाला दिया था।

विधि आयोग कर सकता है विचार

हाल ही में कानून मंत्री किरण रिजिजू ने समान नागरिक संहिता से संबंधित मुद्दे पर दिए एक जवाब में कहा था कि सरकार ने इस मामले को विचार के लिए 21वें विधि आयोग को भेजा था। 21वें विधि आयोग का कार्यकाल वर्ष 2018 में समाप्त हो चुका है। अब इस मुद्दे पर 22वां विधि आयोग विचार कर सकता है।

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