इंदौर की मनोरमागंज निवासी वंदना वाधवानी के निधन के बाद उनकी देह मेडिकल कॉलेज को डोनेट की गई है। इससे पहले उनके पति जवाहरलाल वाधवानी की देह भी डोनेट की गई थी। जवाहरलाल वाधवानी का 29 अप्रैल 2024 को बीमारी के चलते निधन हो गया था।
अब वंदना वाधवानी के निधन के बाद परिवार ने उनकी मंशानुसार उनकी भी देह मेडिकल कॉलेज को डोनेट की है। दोनों पति-पत्नी काफी परोपकारी थे। उनका मानना था कि मृत्यु के बाद भी अगर उनकी देह किसी के काम आए तो इससे पुण्य कार्य और कुछ नहीं सकता।

कहते थे मेरी देह को डाेनेट कर देना
दरअसल, 71 वर्षीय वंदना की 17 जनवरी 2025 को अचानक तबीयत बिगड़ी। परिवार ने तुरंत एम्बुलेंस बुलाई लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनका निधन हो गया। परीक्षण में पता चला कि उन्हें कार्डियक अरेस्ट हुआ था। उनकी भाभी डॉ. मोना देव ने बताया-
9 माह पहले पहले भाई जवाहरलाल वाधवानी (75) का बीमारी के चलते निधन हो गया था। वे हमेशा कहते थे कि मृत्यु के बाद मेरी देह डोनेट की जाए। ऐसे में उनकी देह मेडिकल कॉलेज को डोनेट की गई थी।
परिवार ने बताया कि दोनों काफी सामाजिक, धार्मिक और परोपकारी थे। वंदना की भी पति के निधन के बाद इच्छा थी कि उनकी भी देह भी पति की तरह मेडिकल कॉलेज को डोनेट की जाए। इसी के चलते 18 जनवरी को उनकी देह एमजीएम मेडिकल कॉलेज को डोनेट की गई है। उनकी दोनों आंखें एमके इंटरनेशनल आई बैंक और स्किन चोइथराम स्किन बैंक को डोनेट की गई है।

बेटे को वीडियो कॉल से कराए दिवंगत मां के दर्शन
वाधवानी के परिवार में बेटी पुनीता और बेटा जयेश हैं। पुनीता इंदौर में ही रहती है, जबकि बेटा कनाडा में है। कुछ दिन पहले ही जयेश एक दुर्घटना में घायल हुए थे जिसके चलते कनाडा में ही बेड रेस्ट पर है। उन्हें मां के निधन के साथ उनकी देह डोनेट करनी की जानकारी दी।
इस पर उन्होंने और बेटी पुनीता ने सहमति दी। इसके बाद देह डोनेट की प्रक्रिया की गई। इसके साथ ही बेटे को वीडियो कॉल कर दिवंगत मां के दर्शन कराए तो उन्होंने नम आंखों से उन्हें नमन किया।

विधि-विधान के साथ कराई अंतिम रस्म
स्व. वंदना की देह डोनेट करने के पहले परिवार ने सनातन धर्म अनुसार पंडित के माध्यम से विधि विधान के साथ अंतिम रस्म की प्रक्रिया पूरी कराई। इस दौरान पूरी रस्म मुक्तिधाम जैसी ही की गई। उनकी देह के चरणों के पास कंडे जलाए। इसके साथ ही परिक्रमा की और दिवगंत की पुण्यात्मा को सदगति और शांति देने के लिए प्रार्थना की। वाधवानी दंपती के इस जज्बे और इंसानियत को समाज ने काफी सराहा है। सोमवार को गीता भवन में उनका उठावना हुआ। अगले हफ्ते 12वें की रस्म होगी।
91 वर्षीय बहरानी सिखा गए इंसानियत का पाठ

रविवार को सर्वोदय नगर इंदौर निवासी पुरुषोत्तम बहरानी (91) का निधन हो गया। वे कुछ दिन से बीमार थे और अस्पताल में एडमिट थे। उन्होंने भी पूर्व में देह दान का फॉर्म भरा था। उनकी इच्छा थी कि उनकी देह मेडिकल स्टूडेंट्स के अध्ययन के लिए काम आए।
रविवार को उनकी देह मान सरोवर मेडिकल कॉलेज, भोपाल को डोनेट की गई। पुरुषोत्तम की पत्नी का 9 साल पहले निधन हो चुका है। उनकी दो बेटियां हैं। वे सरकारी विभाग में चीफ इंजीनियर के पद से रिटायर्ड हुए थे।
सालों तक प्रिजर्व रहती है देह

इंदौर जिला अस्पताल के शव परीक्षण केंद्र के इंचार्ज डॉ. भरत वाजपेयी ने बताया-
देह को सालों तक मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग में सुरक्षित रखा जाता है। अधिकांश देह नॉन एमएलसी वाली ही डोनेट की जाती है। इसके लिए सीधे संबंधित मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग से भी संपर्क किया जा सकता है। इसके अलावा एनजीओ भी इसमें मददगार है। इसकी प्रक्रिया एसडीएम, तहसीलदार के माध्यम से पूरी होती है। देह दान से बड़ा कोई महादान नहीं है। यह कालजयी और सर्वकालिक दान है। देहदानी और उनके परिवार सम्माननीय हैं।
ऐसे पूरी होती देह दान की प्रक्रिया
शरीर की बाहरी और आंतरिक संरचना, व्यावहारिक अध्ययन के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
देह को संबंधित परिवार के लोग ससम्मान मेडिकल कॉलेज तक लाते हैं।
देह को फॉर्मेलिन के सॉल्यूशन में रखा जाता है। इससे सालों तक देह को सुरक्षित रहती है।
फॉर्मेलिन का सॉल्यूशन होने से बॉडी सड़ने, बैक्टीरिया, वायरस आदि से सुरक्षित रहती है।
डोनेट की गई हर देह मेडिकल स्टूडेंट्स के अध्ययन के लिए काफी मददगार होती है
- शरीर की बाहरी और आंतरिक संरचना, व्यावहारिक अध्ययन के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
- एक मेडिकल बैच के 20 से ज्यादा स्टूडेंट्स एक समय में इस पर अध्ययन करते हैं।
- देह को उसके मूल स्वरूप में आठ फीट लम्बी टेबल पर रखा जाता है।
- फिर अलग-अलग दौर में मेडिकल स्टूडेंट्स एक से डेढ़ साल तक इस पर अध्ययन कर करते हैं।
- इस दौरान पेट, लिवर, हड्डियों सहित कई अंगों का अध्ययन करने के साथ
- डिसेक्शन के बाद देह फिर एनाटॉमी विभाग में नहीं रखी जाती। कॉलेज द्वारा ससम्मान अंतिम संस्कार करवा दिया जाता है।
- खास यह कि देह पर लाइव अध्ययन होता है। इसमें रेखांकन जैसा मामला नहीं होता है।
- मेडिकल स्टूडेंट्स को सफल डॉक्टर बनाने में देह दान का बड़ा योगदान होता है।




