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पति की याचिका पर धारा 377 का केस निरस्त: कहा-पत्नी के साथ अप्राकृतिक संबंध दुष्कर्म नहीं, चलता रहेगा दहेज प्रताड़ना का केस

ग्वालियर में दो साल पहले हुई शादी के बाद पत्नी ने दहेज प्रताड़ना के साथ ही अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का आरोप लगाते हुए धारा 377 के तहत हाई कोर्ट में प्रकरण लगाया था। अब पति की याचिका पर मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने धारा 377 का केस निरस्त कर दिया है। याचिका को इस बिंदु पर स्वीकार करते हुए ग्वालियर बेंच ने कहा कि पत्नी के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध दुष्कर्म नहीं, बल्कि क्रूरता करना है।सुप्रीम कोर्ट के कई प्रकरणों में दिए आदेशों का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि पत्नी के साथ अप्राकृतिक सेक्स के मामले में धारा 376 या 377 का केस नहीं बनता।

हालांकि, कोर्ट ने ये भी कहा कि पत्नी की इच्छा के बिना अप्राकृतिक सेक्स करना और मना करने पर मारपीट करना क्रूरता की श्रेणी में आता है। केस के अन्य तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना के केस को निरस्त करने से इनकार कर दिया। ऐसे में दहेज प्रताड़ना का केस चलेगा। केवल धारा 377 का केस निरस्त किया गया है।

ऐसे समझिए पूरा मामला ग्वालियर के सिरोल निवासी एक युवक की शादी ग्वालियर निवासी एक युवती से 2 मई 2023 को हुई थी। विवाह हिंदू रिति-रिवाज और दोनों परिवारों की सहमति से हुआ था। शादी के कुछ महीने बाद ही दोनों में अनबन शुरू हो गई। जिस पर साल 2024 में पत्नी की ओर से कोर्ट में दहेज प्रताड़ना का मामला लगाया गया था। जिसमें पति पर शराब के नशे में रात को अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का आरोप लगाया गया था।

जिस पर सिरोल निवासी पति ने हाई कोर्ट में याचिका दायर करते हुए अपने खिलाफ दर्ज धारा 377 और 498 (ए) का केस निरस्त करने की मांग की। कोर्ट को बताया गया कि आरोप लगाने वाली महिला याची की पत्नी है। 2 मई 2023 को दोनों का विवाह हुआ था। पुलिस में दर्ज शिकायत के अनुसार दहेज में 5 लाख रुपए, एक बाइक और अन्य सामान दिया गया था। शादी के दिन से ही पति शराब पीकर अप्राकृतिक सेक्स करता था और मना करने पर पत्नी के साथ मारपीट करता था।

आरोपी पति की ओर से दलील दी गई कि भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में संशोधन के अनुसार, पत्नी के बालिग होने की स्थिति में पति द्वारा किया गया ऐसा कृत्य बलात्कार या अप्राकृतिक कृत्य की श्रेणी में नहीं आता। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग प्रकरणों का हवाला दिया, जिसमें इस संबंध में पहले भी निर्णय आ चुके हैं। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इसे दुष्कर्म की जगह क्रूरता माना है।

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