विभाजन के बाद भी जीवंत है परंपरा; विधायक सबनानी समेत कई गणमान्य नागरिक हुए शामिल
संत हिरदाराम नगर |
उप नगर में श्रद्धेय राजा वीर विक्रमादित्य महोत्सव का चार दिवसीय आयोजन सोमवार सुबह विधि-विधान और पल्लव के साथ संपन्न हुआ। इस उत्सव ने न केवल भक्ति का संचार किया, बल्कि विलुप्त होती जा रही ‘सिंधी भगत’ कला की यादें भी ताजा कर दीं। समापन अवसर पर समाज की सुख-समृद्धि और विश्व शांति की कामना की गई।
सिंध से भारत तक: सैकड़ों साल पुरानी परंपरा
इतिहास के पन्नों को पलटते हुए आयोजन समिति ने बताया कि सिंध प्रदेश में डाकुओं के आतंक से मुक्ति दिलाने वाले राजा विक्रमादित्य की याद में यह उत्सव मनाया जाता है। विभाजन के बाद 1948 में इसरानी मार्केट और 1962 में संत हिरदाराम नगर में मंदिरों की स्थापना के साथ यह परंपरा भारत में भी जारी रही।
भक्ति संगीत की रही धूम
चार दिनों तक चले इस महोत्सव में देश के ख्यातिलब्ध कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं:
- परमानंद प्यासी और रमेश एंड पार्टी ने पहले दिन समां बांधा।
- कोटा की लख्मीचंद एंड पार्टी के गीतों पर बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष थिरके।
- उल्हासनगर के अनिल भगत ने देर रात तक सिंधी भगत की प्रस्तुति दी, जिसे सुनने विधायक भगवानदास सबनानी भी पहुंचे।
समाज के दिग्गज रहे मौजूद
महोत्सव के समापन पर मंदिर समिति के अध्यक्ष किशोर तेजवानी ने आयोजन की सफलता पर प्रकाश डाला। इस दौरान संरक्षक सुरेश जसवानी, महासचिव जेठानंद मूलचंदानी, कन्हैयालाल इसरानी, पूज्य सिंधी पंचायत अध्यक्ष माधु चांदवानी और दिनेश वाधवानी सहित अनेक गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।
विशेष: सिंधी ‘भगत’ कभी सिंध की पहचान हुआ करती थी, जिसे संत कंवरराम जैसे कलाकारों ने ऊंचाई दी। आधुनिक दौर में ऐसे आयोजनों के जरिए इस लोक कला को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।




