Wednesday, February 11, 2026
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भोपाल के ऑटो ड्राइवर ने 3 जिंदगियां बचाई

रविवार सुबह 4 बजे, भोपाल एम्स के तीन ऑपरेशन थिएटरों में एक साथ जिंदगी और मौत की कहानी लिखी गई। एक ओटी में डॉक्टरों ने 37 वर्षीय युवक के शरीर से दिल और किडनी निकाली, जिसकी सांसें थम चुकी हैं। जबकि सामने वाले ओटी में इन्हीं अंगों से किसी और की धड़कन और उम्मीद लौटी।

अंगदान करने वाले युवक के भाई भारत पाटिल ने बताया कि, मेरा भाई सोते समय बेड से गिरा था। जिससे उसके सिर पर चोट आई। हम उसे लेकर 21 अक्टूबर को सीधे एम्स आए थे। लंबे इलाज के बाद डॉक्टर ने बताया कि वे ब्रेन डेड हो चुके हैं। हमारे पूरे परिवार ने तय किया कि हमारा भाई तो नहीं बच सकता लेकिन वो जाते जाते तीन लोगों को नया जीवन और किसी के जीवन में रोशनी भरने का काम कर सकता है। इस लिए हमने डॉक्टरों की सलाह अंगदान के लिए मंजूरी दी। अंगदान से लेकर ट्रांसप्लांट की पूरी प्रक्रिया में सबसे अहम भूमिका कोऑर्डिनेटर दिनेश मीणा (nursing officer) ने निभाई है।

एम्स भोपाल में यह दूसरी बार है जब एक ब्रेन डेड मरीज तीन लोगों की जिंदगी बचाने का जरिया बना। डॉक्टरों की टीम पूरी रात से तैयारी में जुटी रही। जैसे ही घड़ी में 4 बजे जीवनदान की यह जटिल प्रक्रिया शुरू हुई।

अब एक दिल 40 साल की महिला के सीने में धड़क रहा और दो किडनियों से अलग-अलग मरीजों को नई जिंदगी मिला। एक किडनी एम्स भोपाल और दूसरी किडनी एक निजी अस्पताल को भेजी गई। निजी अस्पताल तक किडनी पहुंचाने के लिए ग्रीन कॉरिडोर भी बनाया गया। जिससे ट्रैफिक रोके बिना ऑर्गन को सुरक्षित समय में पहुंचाया गया।

भाई बोला- सरकार से मदद की उम्मीद है

भाई भारत पाटिल ने बताया कि उनका भाई सोते समय बिस्तर से गिर गया था, जिससे उसके सिर पर गंभीर चोट लग गई। इलाज के दौरान डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया। यह घटना दिवाली के दो दिन बाद की है। भारत ने कहा कि “भाई की जान तो चली गई, लेकिन उसने किसी और को नई जिंदगी दे दी।” उनके भाई के पीछे पत्नी और दो छोटी बेटियां हैं, जिनके लिए परिवार ने सरकार से आर्थिक मदद की अपील की है।

गार्ड ऑफ ऑनर के साथ हुई विदाई एम्स भोपाल में अंगदान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अंगदाता को गार्ड ऑफ ऑनर के साथ अंतिम विदाई दी गई।

एक साथ हुआ हार्ट और किडनी ट्रांसप्लांट एम्स में ही दूसरी तरफ दो ऑपरेशन थिएटर में दो मेजर सर्जरी हुईं। एक मरीज में हार्ट ट्रांसप्लांट किया तो वहीं दूसरे मरीज में किडनी ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया की गई । वहीं, एक किडनी ट्रांसप्लांट बंसल अस्पताल भेजी गई।

हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए सरकार से मिले 5 लाख रुपए एम्स भोपाल में जिस व्यक्ति का हार्ट ट्रांसप्लांट किया जा रहा है, उसके इलाज के लिए आर्थिक रूप से राज्य सरकार द्वारा सहायता दी गई है। एम्स प्रबंधन की माने तो राज्य सरकार से हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए 5 लाख रुपए स्वीकृत हुए हैं।

ब्रेन डेड घोषित होते ही शुरू हुई प्रक्रिया 37 वर्षीय युवक कुछ दिन पहले हेड इंजरी के साथ एम्स भोपाल में भर्ती किया गया था। इलाज के दौरान उसका ब्रेन रिस्पॉन्स पूरी तरह बंद हो गया। ऐसे में परिवार की सहमति मिलने पर डॉक्टरों ने पहले सभी रिवर्सिबल कारण जैसे दवा, शॉक और हाइपोथर्मिया को दूर किया। इसके बाद चार डॉक्टरों की टीम ने छह घंटे के अंतराल पर दो बार जांच की।

टीम ने पुतली, कॉर्नियल, गग, कफ, ऑकुलोसेफेलिक, ऑकुलोवेस्टिब्युलर और श्वसन (एपनिया) रिफ्लेक्स की जांच की। सभी रिफ्लेक्स अनुपस्थित पाए गए और एपनिया टेस्ट पॉजिटिव आया। इसके बाद शनिवार देर शाम युवक को ब्रेन डेड घोषित किया गया। कानूनी रूप से यह मृत्यु मानी जाती है।

एम्स मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. विकास गुप्ता ने बताया कि पहले हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की थी कि ऐसे सभी डोनर्स को गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाएगा। साथ ही, जिन परिवारों को आर्थिक सहायता की आवश्यकता होगी, उन्हें मदद भी प्रदान की जाएगी। इसी घोषणा के तहत पूरी प्रक्रिया पूरी की गई है। ट्रांसप्लांट सफल रहा है।

इन्होंने अंगदान व प्रत्यारोपण में निभाई अहम भूमिका

ब्रेन डेड घोषणा- डॉ. विकास गुप्ता (एमएस), डॉ. सुमित राज (न्यूरोसर्जरी), डॉ. ज्योत्सना कुबरे (एनेस्थीसिया) और डॉ. राजा वडिवेल (न्यूरोसर्जरी)

कार्डियोथोरेसिक सर्जरी- डॉ. योगेश निवारिया, डॉ. एम. किशन, डॉ. सुरेन्द्र यादव, डॉ. राहुल शर्मा, डॉ. विक्रम वाट्टी, डॉ. आदित्य सिरोही

यूरोलॉजी- डॉ. देवाशीष कौशल, डॉ. कुमार माधवन, डॉ. केतन मेहरा

नेफ्रोलॉजी- डॉ. महेन्द्र अटलानी

एनेस्थीसियोलॉजी- डॉ. वैशाली वैंदेसकर, डॉ. सुनैना तेजपाल कर्णा, डॉ. ज़ैनब हक, डॉ. हरीश कुमार

किडनी ट्रांसप्लांट में भोपाल आगे भोपाल के दो प्रमुख सरकारी अस्पताल, एम्स और हमीदिया में किडनी ट्रांसप्लांट रफ्तार पकड़ रहा है। एक तरफ एम्स में 11 किडनी ट्रांसप्लांट हुए, जिसमें से 3 कैडेवरिक ऑर्गन (यानी ब्रेन डेड मरीज से मिली किडनी) ट्रांसप्लांट थे। वहीं, गांधी मेडिकल कॉलेज में 10 किडनी ट्रांसप्लांट हुए और यह सभी लाइव थे।

यानि परिजनों ने अपनों को नया जीवन देने के लिए अपनी किडनी दान की। इसके अलावा, भोपाल का बंसल अस्पताल 400 से अधिक किडनी ट्रांसप्लांट कर चुका है। इन दोनों कैटेगरी (सरकारी और निजी अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट) में भोपाल प्रदेश में सबसे आगे हैं। लेकिन, देश में देखें तो टॉप 10 में भी नहीं है।

देश के अन्य राज्यों की तुलना में प्रदेश काफी पीछे मध्य प्रदेश स्टेट ऑर्गन एंड टिशू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (SOTTO) की कंविनर डॉ. कविता कुमार ने कहा कि अंगदान के मामले में मध्यप्रदेश अभी शुरुआती दौर में है, जैसे एक छोटा बच्चा चलना सीख रहा हो। इस क्षेत्र में अभी काफी काम बाकी है। सबसे अहम है कि अंगदान पर ज्यादा चर्चा हो और सही जानकारी लोगों तक पहुंचे।

जब लोग इसके बारे में बात करेंगे, तो जागरूकता बढ़ेगी। उन्हें इसके फायदे समझ में आएंगे। एक बार जब लोग जान जाएंगे कि अंगदान से कितने लोगों की जान बच सकती है, तब राज्य में अंगदान का ग्राफ तेजी से बढ़ेगा।

उन्होंने आगे कहा, सरकारी अस्पतालों में ब्रेन-डेड मरीज से ऑर्गन डोनेशन शुरू होना जरूरी है। इसके लिए अलग से मैनपावर, पर्याप्त स्पेस और एक बड़े सेटअप की जरूरत होती है। गांधी मेडिकल कॉलेज के पास मैनपावर और जगह तो है, लेकिन ऑर्गन रिट्रीवल के लिए आवश्यक मशीनें और जांच की सुविधा अभी विकसित करनी है।

अच्छी बात यह है कि सरकार इस दिशा में काफी सक्रिय है। हमें भरोसा है कि जल्द ही प्रदेश में अंगदान की स्थिति बेहतर होगी और इसका ग्राफ ऊपर जाएगा।

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