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पत्नियों से प्रताड़ित पति बोले- कोर्ट झूठे केस खत्म करें

मध्यप्रदेश में पत्नियों की प्रताड़ना से परेशान पुरुषों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए समाज में मांग उठ रही है। भोपाल में वॉच लीग संस्था ने घरेलू हिंसा और दहेज प्रताड़ना से मुकदमे झेल रहे पतियों के साथ शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस की।

पत्नियों से प्रताड़ित पतियों और परिवारजनों ने अपनी पीड़ा बताते हुए कोर्ट से ऐसे केस खत्म करने की मांग की। उन्होंने कहा कि झूठे केस दर्ज कराने से परेशान पुरुष सुसाइड के लिए मजबूर हो रहे हैं। हमारी बात सुनने वाला कोई नहीं है।

नेत्रहीन पति बना बैंक अफसर, तो पत्नी बोली- मां–बाप से अलग हो जाओ भोपाल के एक बैंक में असिस्टेंट मैनेजर आफताब अली नेत्रहीन दिव्यांग हैं। वह पत्नी की प्रताड़ना की दास्तां सुनाते हुए कहते हैं- मेरी 2017 में शादी हुई थी। उसके बाद जब मेरी नौकरी लगी, तो लड़की के घरवालों ने हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया कि आप अपने मां-बाप को छोड़कर अलग हो जाइए। हमने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की।

पत्नी बार-बार अपनी मर्जी से मायके जाने लगीं। वह अपने भाई के साथ अंतिम बार मायके गईं। उसके बाद हम लोग उन्हें लेने गए, घर के लोगों को भी भेजा। फोन पर भी वापस आने को कहा। वह हमारे घर आने के बजाय ताना देती थीं कि घरवालों से अलग हो जाओ।

गुजरात और यूपी में पत्नी ने दर्ज कराए मुकदमे

आफताब ने बताया कि पत्नी ने पहले तो गुजरात के गोधरा में मेरे ऊपर केस लगाया। इन्होंने 498 का आवेदन दिया था। हमें पुलिस ने नोटिस देकर बुलाया। उनके आवेदन में जो कहानी लिखी थी, वह दूसरे आवेदन से अलग है। दूसरी एफआईआर इन्होंने यूपी में दर्ज कराई, उसमें उन्होंने जिस तारीख का उल्लेख करते हुए केस दर्ज कराया। उस समय मैं अपने ऑफिस में था। उन्होंने यह सोचा कि दूसरा शनिवार है, तो उस दिन छुट्टी रहेगी। क्योंकि, हमसे उनका फोन पर संपर्क तो था नहीं। कॉल मैं ही करता था।

पत्नी ने झूठी घटना बनाकर गलत एफआईआर दर्ज करा दी, जबकि वह तो पहले से ही हमारे घर पर नहीं थीं। उन्होंने दहेज मांगने, प्रताड़ित करने की बात तो आवेदन में लिखी, साथ ही तीन तलाक का भी उल्लेख कर दिया। उन्होंने जेल भिजवाने के लिए जो कर सकती थीं, वह सब किया। उनका मायका अलीगढ़ में है। लड़की के मामा, जो खुद नेत्रहीन दिव्यांग थे, उन्होंने मेरा रिश्ता कराया था। लड़की सामान्य है, उसे कोई दिक्कत नहीं है।

पुलिस ने बिना जांच एफआईआर दर्ज की

यूपी पुलिस ने बिना जांच के एफआईआर दर्ज कर दी। जिस घटना को बताकर अलीगढ़ पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई गई, उस घटना से पहले गुजरात के गोधरा में एक अलग 125 का केस कराया गया था। गोधरा के आवेदन में लिखा था कि मैं अपने बहनोई के घर आ गई हूं, मुझे भोपाल से मारपीट कर घर से निकाल दिया गया। उसमें यह घटना लिखी गई और अलीगढ़ के आवेदन में लिखा है कि 14 सितंबर 2019 को इन्होंने मारपीट कर छोड़ा।

‘पुलिस अफसरों के परिवार की बेटी ने मुझसे करोड़ों वसूले’

रायपुर के मनीष शुक्ला गुवाहाटी में इंजीनियर हैं। मनीष ने अपनी दास्तां सुनाते हुए कहते हैं- साल 2019 से घरेलू हिंसा, मारपीट और दहेज, तलाक का मामला लगा हुआ है। मेरी ससुराल पक्ष के लोग पुलिस के बड़े अधिकारी हैं।रिटायर्ड डीएसपी, एसपी स्तर के लोग हैं। मुझसे पैसों की वसूली करने के लिए मुझे फंसाया गया है। मैं गुवाहाटी से आता हूं और इस फर्जी मामले को झेल रहा हूं। मेरी शादी भोपाल में हुई थी। ससुराल के बगल में, उनके दबाव में मैंने भोपाल में घर खरीदा था। वह घर भी उनके कब्जे में है।

मनीष शुक्ला आगे कहते हैं- मेरी शादी 2007 में हुई थी। मेरे पिताजी इनके संपर्क में आए थे। उन्होंने मेरी अरेंज मैरिज कराई थी। मेरी पत्नी शुरुआत में कुछ जॉब करती थी, लेकिन मेरी आय इतनी थी कि उन्हें नौकरी करने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। फिर वह मेरा पैसा ही बटोरने का काम करने लगी। मेरा एक बेटा है, जो 2019 से पत्नी के पास ही है। न मैं उससे मिल पाता हूं, न बात कर पाता हूं। कोर्ट ने आदेश दिया हुआ है कि बच्चे से कोर्ट में मिलवाओ, लेकिन वह बच्चे को लेकर ही नहीं आती। मैं गुवाहाटी से बच्चे से मिलने के लिए आऊंगा भी तो बच्चा नहीं मिलेगा। यह एक अलग ट्रॉमा है।

केस दर्ज कराने के बाद महिला कोर्ट नहीं आती

मनीष शुक्ला कहते हैं- मैं सरकार से यह चाहता हूं कि हमारे ऊपर फर्जी मामले लग ही जाते हैं। आप यह देखिए कि जिस पक्ष ने फर्जी मामला लगाया है, वह बड़े प्रभावशाली लोग हैं, तो सिस्टम उनके पक्ष में काम करता है और हम प्रताड़ित होते हैं और अगर हमें तारीख दी गई है और हम गुवाहाटी जैसी दूरी से आ रहे हैं, तो आने-जाने में खर्चा होता है। अगर उस तारीख पर सुनवाई नहीं हो पा रही है, तो जज साहब को अगले एक-दो दिन की तारीख देनी चाहिए।

मेरे खिलाफ 2019 से ऐसे रिश्तेदारों को मारने का केस लगा हुआ है जो पुलिस में अफसर हैं। यह सरासर झूठ है। उनके वकील भी ऐसे होते हैं जो पैकेज डील कराते हैं कि हम इतनी एलिमनी दिला देंगे, मेंटेनेंस दिला देंगे। तो उनके वकील भी ऐसे होते हैं जो हमें चारों तरफ़ से प्रताड़ित करते हैं। तो हम हर तरह से प्रताड़ित होते हैं।

भोपाल में पुलिस को नहीं मिल रहा केस दर्ज कराने वालों का घर

मेरे मामले में जैसे मैं शनिवार या सोमवार को आ पाता हूं, क्योंकि बीच में रविवार का उपयोग कर पाऊं। तो सामान्यतः शनिवार को जज साहब की मीटिंग होती है। मैं आया और जज साहब की मीटिंग हो गई, तो मेरे 30 हज़ार रुपए नाली में गए। जज साहब को यह ध्यान देना चाहिए। जैसे मेरे मामले में पुलिस के बड़े रिटायर्ड अधिकारी को पुलिस नहीं ढूंढ पा रही है। समन जाता है और लौटकर वापस आ जाता है। पुलिस वाले और कोर्ट पुलिस, रिटायर्ड अफसर को ढूंढ़ ही नहीं पा रहे हैं।

पत्नी ने एक-एक कर 11 केस लगवा दिए

निर्मल सिम्पी ने बताया- मैं सर्जिकल डिवाइस का काम करता हूं। मेरा ज्युडिशियरी से यह कहना है कि बच्चों की कस्टडी के लिए केस लगाया जाता है तो न्यायपालिका ये देखे कि केस जल्दी खत्म हो। क्योंकि, केस लंबा चलता है और बच्चा 18 साल का हो जाता है। तब तक बाप तो बच्चे से मिल ही नहीं सकता। ये तो औरत की ही जीत तो है। इक्का–दुक्का केसों को छोड़कर कहीं ऐसा नहीं हुआ कि बच्चे की कस्टडी पिता को मिली हो।

निर्मल सिम्पी आगे कहते हैं- कस्टडी वाले मामलों में न्यायपालिका तुरंत एक्शन ले, क्योंकि महिलाएं बच्चे को दिखाकर ही मेंटेनेंस लेती हैं। न्यायपालिका सबसे पहले यही निर्णय करती है कि अगर बच्चा है, तो आप उसे मेंटेनेंस के पैसे दो। तो ये झूठे केस बंद होने चाहिए। जिस महिला ने केस लगाया और महिला ही कोर्ट नहीं आ रही, उसके खिलाफ 18 गिरफ्तारी वारंट निकले हैं। यदि केस लगाकर महिलाएं ही कोर्ट नहीं आ रहीं, तो केस खारिज क्यों नहीं होता?

6 साल से बेटे से मिलने के लिए परेशान हूं

मैं पिछले 6 साल से बेटे से मिलने के लिए परेशान हो रहा हूं। कोर्ट ने कहा है कि दूसरे और चौथे शनिवार को बच्चे को लेकर आना है, लेकिन वो बहाने बनाकर नहीं लाती। बीच में पांच–पांच महीने तक गायब हो जाती है। एक कपल का बच्चा है, तो जितना मां का अधिकार है, उतना ही पिता का भी अधिकार है। या तो आप अधिकार ही खत्म कर दीजिए। अकेली मां तो बच्चा पैदा नहीं कर सकती। क्या पिता के इमोशन नहीं होते? हमारी भावनाओं पर कोई ध्यान नहीं देता। हम काम पर फोकस नहीं कर पाते। मेरे खिलाफ 11 झूठे केस लगे हैं।

शादी के 17 साल बाद दहेज प्रथा का केस लगा

मैंने 2003 में लव मैरिज की थी और शादी के 17 साल बाद दहेज प्रथा का केस लगा। नियम ये है कि 7 साल बाद दहेज प्रताड़ना का केस नहीं लग सकता। उसके बाद मेरे खिलाफ घरेलू हिंसा का केस लगाया हुआ है। मैं अपने बेटे से ढाई घंटे के लिए कोर्ट में मिलना होता है। वहां पर भी मां सामने बैठी रहती है तो बच्चा अगर मुझसे बात करना चाहे भी तो बात नहीं कर सकता। उसे मां का इतना डर होता है कि वो बात नहीं कर सकता। जब जज के सामने बात करते हैं तो मां झूठे आरोप लगाती है कि ये बच्चे को जान से मार देंगे। आज तक किसी केस में किसी पिता ने बच्चे को जान से मारा हो तो बताइए।

पत्नी की प्रताड़ना से भाई ने कर ली आत्महत्या मेरा नाम सूरज पडियार है- मेरा भाई नितिन पडियार, जिसकी उम्र 27 साल थी, उसने अपनी पत्नी, सास और सालियों से प्रताड़ित होकर 20 जनवरी को आत्महत्या कर ली थी। उसकी पत्नी ने राजस्थान के कुचामन सिटी में नितिन, मेरी मां और मेरे खिलाफ केस लगाया था। अगस्त 2019 में नितिन और हर्षा की लव मैरिज आर्य समाज मंदिर में हुई थी। उसके बाद लड़की हमारे साथ रही। लड़की के घर वालों ने कभी नितिन को एक्सेप्ट नहीं किया। हमने लड़की को एक्सेप्ट किया, शादी की, रिसेप्शन भी किया।

सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था, लेकिन जैसे ही लड़की की अपनी मां से बातचीत शुरू हुई, उसने अलग मकान दिलाने की डिमांड शुरू कर दी। उसका गृहक्लेश बढ़ता गया। कुछ समय बाद नितिन–हर्षा के एक बेटा हुआ। वह बच्चा जब 5 महीने का हुआ तो हर्षा ने कहा कि राजस्थान में एक पूजा करानी होती है, उसके लिए मैं जा रही हूं। तब नितिन ने उसकी बहन के साथ पत्नी को भेज दिया। छह–सात महीने तक नितिन की हर्षा से बात होती रही। वह कहने लगी कि तुम मेरे नाम से अलग घर लेकर अपने माता–पिता से अलग रहो। नितिन ने जब पत्नी की डिमांड सिरे से खारिज कर दी, तो लड़की ने अप्रैल 2024 में 498 का झूठा केस नितिन, मेरी मां और मेरे ऊपर दर्ज कराया। पुलिस ने बिना जांच किए झूठा केस दर्ज कर लिया। उसके बाद हमें 4 महीने तक लगातार पुलिस वाले बुलाते रहे।

पुलिस ने मां और मेरा नाम हटाने 50 हजार रुपए मांगे

सूरज ने आगे बताया – हमें पुलिस ने काउंसलिंग के लिए तीन–चार बार बुलाया। वहां के टीआई सुरेश चौधरी का कहना था कि आप 50 हजार रुपए दो तो आपका और आपकी मां का नाम एफआईआर में से हटा दूंगा। जब हमने पैसे देने से मना कर दिया तो टीआई सुरेश चौधरी और आईओ रामलाल जाट ने अक्टूबर में नितिन के साथ मारपीट की थी। उसके बाद हमने न्यायालय से ज़मानत कराई तो लड़की की मां और बहनों ने रेप केस लगाने की धमकी दी। 31 जनवरी को पहली तारीख थी और उसके पहले ही 20 जनवरी को नितिन ने आत्महत्या कर ली थी।

भाई की आत्महत्या के बाद भी कोर्ट कहता है- आप और मां आरोपी हैं

सूरज कहते हैं- भाई के सुसाइड करने के बाद भी कोर्ट कह रहा है कि अभी आप दो आरोपी हैं। इस केस में, तो आप दोनों को कोर्ट आना पड़ेगा। अभी भी प्रताड़ना खत्म नहीं हुई है। एक इंसान के जाने के बाद भी अगर टॉर्चर खत्म नहीं हो रहा, तो क्या जो नितिन ने किया वही सबको करना चाहिए? मैं मानता हूं कि आत्महत्या करना गलत है, लेकिन बिना जांच के ऐसे झूठे केस दर्ज कर लिए जाते हैं, एक तरफ़ का तथ्य सुना जाता है।

सूरज ने आगे कहा- नितिन के सुसाइड के बाद हम लोगों ने बीएनएस की धारा 108 के तहत केस दर्ज कराया है। जिसके लिए हमें दो बार प्रोटेस्ट करना पड़ा। सिर्फ एक बार पुलिस कुचामन सिटी खानापूर्ति करने गई। बड़े–बडे़ गैंगस्टर को पकड़ने वाली पुलिस उन चार महिला आरोपियों को नहीं पकड़ पा रही।

मैरिटल टेररिज्म के मामले कोर्ट सिरे से ख़ारिज करे

वॉच लीग संस्था की चंदना अरोरा कहती हैं- वॉच लीग कई ऐसे पुरुषों के लिए काम कर रही है। जिन्हें वैवाहिक आतंकवाद या मैरिटल टेररिज्म का शिकार बनाया गया है। हम न्यायपालिका से यह गुहार लगा रहे हैं कि कई बार घरेलू हिंसा, 498 जैसे कई मामले फर्ज़ी लगाए जाते हैं। हमारी जजों से अनुरोध है कि इस तरह के मामलों को सिरे से ख़ारिज कर दिया जाए।

‘पैकेज ऑफर करने वाले वकीलों पर भी कार्रवाई हो’

चंदना अरोरा कहती हैं- सुप्रीम कोर्ट के जज अपने अधीनस्थ न्यायालयों को इस तरह के निर्देश दें कि ऐसे मामले सिरे से ख़ारिज कर दिए जाएं। जब कोई महिला अपने पति के खिलाफ कोर्ट में केस फाइल करने जाती है तो कई वकील एक पैकेज ऑफ़र करते हैं। चाहे उसमें घरेलू हिंसा हुई हो या नहीं, दहेज एक्ट बनता हो या नहीं, लेकिन वकील पैकेज के लिए सलाह देते हैं कि ये चार मामले लगा दीजिए, बहुत बुरी तरह से परेशान होगा, आप जितना चाहेंगी उतना पैसा देगा। आप अपने पति को प्रताड़ित करके जो चाहें लूट लो। इन मामलों में हम चाहते हैं कि जुडिशियरी ऐसे पैकेज ऑफ़र करने वाले वकीलों पर भी कार्रवाई करे।

कुछ ऐसे कानून जोडे़ जाएं। जैसे पहले घरेलू हिंसा का कानून नहीं था। उसको जोड़ा गया। क्योंकि वो क्राइम होता था। आज महिलाएं ब्लैकमेल कर रहीं हैं तो उसकी धारा बने। महिला पति और ससुराल पक्ष को प्रताड़ित कर रही है तो उसकी धारा जोड़ी जाए।

महिला पुलिस के साथ टॉर्चर करती है तो पुलिस के सीनियर अफसरों को ये देखना चाहिए। सतना में पत्नी ने सिर्फ एक एसएमएस किया और डॉक्टर पति जेल में हैं। ऐसे मामलों में न्यायपालिका को देखकर डिसमिस करना चाहिए।

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