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भोपाल में 50 से ज्यादा अवैध प्लास्टिक री-साइक्लिंग यूनिट

नेशनल ग्रीन ट्रूब्नल (NGT) ने मध्यप्रदेश और नगरीय निकायों को प्लास्टिक प्रदूषण और माइक्रोप्लास्टिक्स से निपटने के लिए सुझाव और निर्देश जारी किए हैं। भोपाल का उदाहरण देते हुए कहा कि भोपाल में 50 से अधिक अवैध प्लास्टिक रीसाइक्लिंग यूनिट हैं। इससे करीब 2 लाख लोगों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

एनजीटी की केंद्रीय क्षेत्र पीठ भोपाल के न्यायमूर्ति श्यौ कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी ने इस मामले में टिप्पणी की है। अधिकरण ने नोट किया कि भोपाल में 50 से अधिक अवैध प्लास्टिक रीसाइक्लिंग यूनिटें लगभग 2 लाख नागरिकों के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न कर रही हैं। इसलिए उपाय जरूरी है।

एनजीटी ने ये निर्देश दिए

  • वर्तमान तकनीकों का परीक्षण और मूल्यांकन।
  • वायु, जल और मिट्टी से माइक्रोप्लास्टिक हटाने के लिए नई तकनीकों का विकास।
  • वस्त्र, टॉयर, डिटर्जेंट, सड़क सतह और अन्य उत्पादों के टिकाऊ डिजाइन को बढ़ावा।
  • व्यक्तिगत देखभाल और कॉस्मेटिक उत्पादों में माइक्रोप्लास्टिक पर प्रतिबंध।
  • माइक्रोफाइबर फिल्टर वाले वॉशिंग मशीनों का उपयोग।

ये अपशिष्ट प्रबंधन

  • प्लास्टिक और ठोस अपशिष्ट के बेहतर प्रबंधन से पर्यावरण में रिसाव कम करना।
  • बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक और रीसाइक्लिंग को बढ़ावा।
  • नदियों, वेटलैंड और समुद्र तटों की सफाई।
  • सीवेज और वर्षा जल प्रणालियों में फिल्टर/स्क्रीन लगाना।
  • नगर निगम जल आपूर्ति और वेटलैंड में माइक्रोप्लास्टिक की निगरानी वर्ष में दो बार करें।

स्वास्थ्य और जोखिम का यह मूल्यांकन

  • वर्ल्ड हेल्थ रिपोर्ट के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक का सेवन मानव स्वास्थ्य के लिए कम चिंता का विषय है, पर लंबी अवधि के अध्ययन की आवश्यकता है। इसके चलते CPCB, ICMR और अन्य विशेषज्ञ संस्थानों द्वारा अध्ययन और मानक विकसित किया जाए।
  • अवैध यूनिट बंद करें या बाहर करें
  • अवैध प्लास्टिक यूनिटों का नियंत्रण या औद्योगिक क्षेत्रों में स्थानांतरण।
  • गैर-बायोडिग्रेडेबल मल्टी-लेयर प्लास्टिक (MLP) को बायोडिग्रेडेबल विकल्प से बदलना।

27 मार्च को होगी सुनवाई एनजीटी ने कहा है कि राज्य और जिला स्तर की समितियां प्लास्टिक कचरा और माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी करें। वहीं, चार सप्ताह के भीतर यानी, 27 मार्च तक पर्यावरण सचिव को कार्रवाई की रिपोर्ट जमा करें। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, क्षेत्रीय अधिकारी समेत भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, रीवा और उज्जैन नगर निगम इस मामले को गंभीरता से लें।

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