शाहबानो केस पर आधारित फिल्म ‘हक’ की रिलीज पर विवाद गहराता जा रहा है। शाहबानो की बेटी और कानूनी वारिस सिद्दिका बेगम खान ने फिल्म के रिलीज, प्रदर्शन और प्रमोशन पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। इसके लिए उन्होंने फिल्म के डायरेक्टर सुपर्ण एस. वर्मा, जंगली पिक्चर्स, बावेजा स्टूडियोज और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के चेयरपर्सन को कानूनी नोटिस भेजा है। मामले में हाईकोर्ट इंदौर में याचिका लगाई गई है, जिस पर आज सुनवाई है।
सिद्दिका बेगम के वकील तौसीफ वारसी ने बताया कि फिल्म के मेकर्स ने शाहबानो पर फिल्म बनाने से पहले उनकी कानूनी वारिस से कोई अनुमति नहीं ली। याचिका में कहा गया है कि फिल्म में शरिया कानून की नकारात्मक छवि दिखाई गई है, जिससे मुस्लिम समुदाय की भावनाएं आहत हो सकती हैं।
7 नवंबर को रिलीज होने वाली है फिल्म
वारसी ने आगे कहा कि यह फिल्म शाहबानो के जीवन और 1970 के दशक में महिलाओं के अधिकारों को लेकर चले ऐतिहासिक मुकदमे पर आधारित है, लेकिन बिना अनुमति और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। फिल्म में यामी गौतम और इमरान हाशमी मुख्य भूमिकाओं में हैं। यह फिल्म 7 नवंबर को रिलीज होने वाली है।
शाहबानो की बेटी की याचिका में ये भी कहा गया है कि फिल्म हक स्वर्गीय शाहबानो बेगम की निजी और व्यक्तिगत जीवन को दर्शाती है, जिसमें उनके परिवार से जुड़े कई संवेदनशील घटनाक्रम, पर्सनल एक्सपीरियंस और सोशल परिस्थितियां शामिल हैं। वकील ने कहा कि उनकी मुवक्किल सिद्दिका के पास उनकी मां शाहबानो के जिंदगी के मोरल और लीगल अधिकार सुरक्षित हैं।
क्या है शाहबानो केस?
शाहबानो बेगम मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली एक मुस्लिम महिला थीं। उनकी शादी मोहम्मद अहमद खान नामक वकील से हुई थी। शाहबानो को उनके पति ने तीन तलाक देकर घर से निकाल दिया था। तलाक के बाद शाहबानो ने मैंटेनेंस के लिए अदालत में याचिका दायर की थी। 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के पक्ष में फैसला दिया। जबकि मुस्लिम शरियत कानून के मुताबिक महिला को सिर्फ इद्दत (तलाक या पति की मौत के बाद मनाया जाने वाला शोक) तक ही मेंटेनेंस दिया जाता है। कोर्ट के फैसले का मुस्लिम संगठनों द्वारा जमकर विरोध किया गया था। कहा गया कि कोर्ट का फैसला इस्लाम के शरिया कानून के खिलाफ है।
इस मुद्दे पर राष्ट्रीय बहस छिड़ गई, जिसके बाद भारी राजनीतिक दबाव के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी सरकार ने 1986 में “मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम” पारित किया। इस कानून में कहा गया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला को भरण-पोषण केवल इद्दत की अवधि (लगभग 3 महीने) तक ही मिलेगा। हालांकि समय के साथ मुस्लिम महिलाओं को भी मेंटेनेंस मांगने का अधिकार दिया जाने लगा।




