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MP: रायसेन के बाद अब विदिशा में भी मंदिर खोलने की उठी मांग, मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने का किया दावा

विदिशा: देश में ऐसे कई मंदिर हैं जो आज भी गुमनामी और जंजीरों में जकड़े हुए हैं ऐसा ही एक मंदिर है, विदिशा में स्थित बीजा मंडल विवादित स्थिति होने के कारण आज भी इस मंदिर पर पूजा करने की अनुमति नहीं है।शब्द “बीजामंडल” की उत्पत्ति संभवत इस स्थापत्य संरचना के वास्तविक नाम विजय मंदिर के पश्चात हुई थी। साक्ष्यों से पता चलता है कि विजय मंदिर का निर्माण परमार शासक द्वारा 11वीं शताब्दी में किया गया था, जिसे 1682 ईस्वी में मुगल शासक औरंगजेब द्वारा खंडित कर दिया गया था तथा उस पर एक मस्जिद का निर्माण कराया करवाया, जिसमें इसी पूर्व मंदिर के स्तंभों तथा अन्य भागों का ही प्रयोग किया गया। इस मस्जिद को आलमगीरी मस्जिद कहा जाता था तथा विदिशा को आलगीरपुर का नाम दिया गया था जो कि लोकप्रिय नहीं हो पाया। क्या है मंदिर का इतिहासइस मंदिर के स्तंभ युक्त मंडप के एक स्तंभ पर उत्कीर्ण अभिलेख के अनुसार इस मंदिर का तादात्म्य “चर्चिका देवी” से स्थापित किया जाता है। इस अभिलेख में परमार शासक नर बर्मन का भी उल्लेख आता है। ऐसा माना जाता है कि उक्त देवी का एक अन्य नाम विजया भी था। जिस कारण मंदिर का नाम विजय मंदिर पड़ गया। इस मंदिर की दीवार से सन 1186 ईसवी का उदयवर्मन का अभिलेख मिला है। यहां पर सन 1971 से 1972 में भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मध्य मंडल के अंतर्गत हुए उत्खनन में मंदिर के दक्षिणी भाग में एक अन्य अभिलेख प्राप्त हुआ, जो सूर्य उपासना से प्रारंभ होता है। यह अभिलेख देवनागरी लिपि के संस्कृत भाषा में है। यद्यपि इससे किसी तिथि का कोई ज्ञान नहीं होता। परंतु भाषा तथा शब्दों की बनावट से यह 1100 शताब्दी का माना जा सकता है।सूर्य मंदिर होने के लगाए जा रहे कयासयह जब परमार शासक इस क्षेत्र में राज कर रहे थे तथा विजय मंदिर का निर्माण किया गया। यहीं से प्राप्त एक अन्य अभिलेख से भगवान “भेल्लस्वामिन” का उल्लेख किया गया है, जिसका तात्पर्य “सूर्य भगवान” जिसके कारण ही वर्तमान विदिशा भेलसा के नाम से जाना जाता है तथा इस मंदिर को सूर्य भगवान से जोड़ा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि तत्कालीन शासक सूर्य के अनन्य भक्त थे, जिनके सम्मान में यह मंदिर निर्मित किया गया। यह भी हो सकता है कि बीजा मंडल वास्तविक रूप से सूर्य मंदिर रहा होगा। मंदिर-मस्जिद में फंसा पेंचबीजा मंडल प्राचीन समय में एक हिंदू मंदिर हुआ करता था। मुगलों के आक्रमण के बाद यह मंदिर मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया। आपको यहां एक ऊंचा और बड़ा सा मंडप देखने के लिए मिलेगा। इस मंडप के ऊपर लाइन से सुंदर भवन बने हुए हैं। यह भवन पत्थर के बने हुए हैं और बहुत ही अद्भुत लगते हैं। बीजा मंडल को बहुत सारे नामों से जाना जाता है। बीजा मंडल पर प्राचीन अवशेष देखने के लिए मिलते हैं। यह पूरा मंडप पत्थर का बना हुआ है। यह देखने में बहुत ही अद्भुत लगता है। यहां पर सुंदर गार्डन बना हुआ है और गार्डन के बीच में आपको यह संरचना देखने के लिए मिलती है, जो बहुत अद्भुत है। यहां पर संग्रहालय भी है। इस संग्रहालय में प्राचीन मूर्तियां रखी गई है।बीजा मंडल का इतिहास हजार वर्ष पुराना है और कई वर्षों से विवादित रहा है। किसी भी शासकीय अधिकारी या राजनीतिक या सामाजिक लोगों ने इसके समाधान के विषय में कभी नहीं सोचा। विदेशी आक्रांताओं द्वारा विध्वंस किया गया यह मंदिर अपनी दुर्दशा की स्थिति बयां खुद कर रहा है और कब इसका जीर्णोद्धार होगा इसके बाट जो रहा है।हिंदू जागरण मंच के जिला अध्यक्ष का कहना है कि ऐसे स्थान जहां विवादित हैं> वहां पर अगर मजार है तो उस पर चादर तो चढ़ाई जा रही है लेकिन हिंदू समुदाय को पूजा पाठ करने से रोका जा रहा है जबकि ऊपर से नीचे तक सनातनी लोग शासन में बैठे हुए हैं। शासन करने वाले लोग हिंदू हैं इसके बाद भी विवादित स्थानों पर दूसरे समुदाय के लोगों को नहीं रोका जाता जबकि हिंदूओ के पूजा करने ऐसे स्थानों पर जाने से रोक लगाई जाती है।

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