भोपाल | राजधानी में शराब दुकानों की नीलामी के पहले ही दिन आबकारी विभाग को तगड़ा झटका लगा है। सरकार ने बड़े ठेकेदारों का एकाधिपत्य (Monopoly) तोड़ने के लिए इस बार दुकानों को छोटे समूहों में बांटा था, लेकिन बड़े समूहों की ‘घेराबंदी’ के कारण सोमवार को 29 दुकानों के लिए एक भी टेंडर नहीं आया। विभाग अब इन दुकानों के लिए नए सिरे से टेंडर प्रक्रिया शुरू करेगा।
क्यों खाली रहे टेंडर के डिब्बे?
जानकारों की मानें तो बड़े शराब ठेकेदार नहीं चाहते कि इस धंधे में नए और छोटे कारोबारी एंट्री करें। अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए बाजार में ‘घाटे’ का डर फैलाया जा रहा है, ताकि छोटे लाइसेंसी बोली लगाने से पीछे हट जाएं और सरकार मजबूर होकर दोबारा बड़े ग्रुप बना दे।
मुनाफे का सच: आंकड़ों के अनुसार, साल 2025-26 में फरवरी अंत तक हर ग्रुप ने 50 करोड़ रुपये से ज्यादा का मुनाफा कमाया है। ऐसे में घाटे की बात महज एक रणनीति नजर आ रही है।
इस बार क्या बदला?
- छोटे ग्रुप: पहले 87 दुकानों को सिर्फ 4 बड़े ग्रुप में बांटा गया था, जिसे अब बढ़ाकर 20 ग्रुप कर दिया गया है।
- महंगे हुए ठेके: पिछले साल की तुलना में इस बार रिजर्व प्राइस में 20% की बढ़ोतरी की गई है।
- राजस्व का लक्ष्य: भोपाल की 87 दुकानों से सरकार को 1432 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है, जो पिछले साल से 239 करोड़ रुपये अधिक है।
पिपलानी सबसे महंगा ग्रुप
इस बार भोपाल का सबसे महंगा शराब समूह ‘पिपलानी’ है। इसमें 4 दुकानें शामिल हैं, जिनकी आरक्षित कीमत करीब 127.77 करोड़ रुपये तय की गई है। इसी तरह बाग सेवनिया ग्रुप की कीमत भी बढ़कर 121 करोड़ रुपये के पार पहुंच गई है।
दूसरे फेज की तैयारी शुरू
पहले दिन टेंडर न आने के बावजूद आबकारी विभाग अपनी नई नीति पर कायम है। मंगलवार से अन्य ग्रुपों के लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि पारदर्शी ई-टेंडरिंग के जरिए ही आवंटन होगा ताकि नए लोगों को मौका मिले और सरकार का खजाना भी भरे।




