अक्टूबर से मार्च के बीच विदेशी मेहमानों के लिए जबलपुर पसंदीदा ठिकाना होता था। मेहमानों को अब यहां की हरियाली रास नहीं आ रही हैं। पिछले तीन दशक में 80 फीसद से ज्यादा परिंदों ने यहां से मुंह मोड़ लिया है। पक्षी प्रेमी और पर्यावरणविद इसके लिए प्राकृतिक क्षेत्रों में बढ़ते मानव दखल को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है इसी तरह जलीय जीवों को भोजन की कमी भी परिंदों को परेशान कर रही है।पर्यावरणविद जगत फ्लोरा के मुताबिक पिछले 30 साल से पक्षियों की निगरानी कर रहे हैं। उनके पास हर साल का डेटा रखा है। करीब 30 साल पहले जबलपुर में देशी और विदेशी परिंदों के एक ठिकानों पर तीन से पांच हजार की संख्या होती थी। जो अब घटकर 200-300 के बीच हो गई है। डुमना नेचर पार्क के खंदारी जलाशय में अकेले बड़ी संख्या में विदेशों से आने वाले पक्षी चार माह डेरा डालने आते थे। उनकी दर्जनों प्रजाति आती थी। अब उनकी संख्या बहुत कम हो गई है। जगत फ्लोरा ने कहा कि खंदारी जलाशय बहुत शांत क्षेत्र है जहां पर्याप्त मात्रा में भोजन भी पक्षियों को मिलता है। पिछले कुछ सालों ने इस क्षेत्र में लोगों का दखल बढ़ने से परिंदों को परेशानी हुई है। ऐसा ही कुछ शहर के अन्य तालाब और ग्रामीणों इलाकों के तालाबों में दिखाई दे रहा है। यहां भी पक्षी कम संख्या में आ रहे हैं।
125 प्रजाति विदेशी मेहमानों की: पर्यावरणविद जगत फ्लोरा ने कहा कि शहर में 350 प्रजाति अभी तक चिन्हित हुई है। इसमें 125 प्रजाति विदेशी मेहमानों की है। ये वो होते हैं जो ठंडे इलाकों से यहां चार माह के लिए आते हैं। सर्दियों में ठंडे इलाकों में पूरी तरह से बर्फ जमने की वजह से भोजन की दिक्कत होती है इस वजह से परिंदे इस ओर पहुंच जाते हैं। उनके लिए अनुकूल माहौल होने पर ही वे ठहरते हैं। परिंदों को तालाब और जलाशय जहां शोर शराबा न हो तथा पर्याप्त जलीय जींव भोजन के लिए मिले। ऐसे स्थान उन्हें पसंद आते हैं।
शिकार भी भरपूर: शहर में विदेशी परिंदों का शिकार भी उनके मुंह मोड़ने की बड़ी वजह है। पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि परिंदों का शिकार कर शहर के आसपास के ढ़ाबे में परोसा जाता है।कई जगह तो तलाब के पानी में करंट और जहर मिलाकर पक्षियों का शिकार किया जाता है। इस वजह से जल में रहने वाले जलीय जींव भी मर जाते हैं।अवैध कब्जे और प्रदूषण: शहर के भीतर के सूपाताल, गोपालबाग, हनुमानताल, रानीताल, गोकलपुर ताल,गंगासागर, महानद्दा, आधारताल तालाब, पनागर, सूखा,शहपुरा, बरगी समेत कई इलाकों में भरपूर विदेशी मेहमान आते हैं लेकिन इनमें कई स्थानों पर ताल को धीरे-धीरे मिट्टी डालकर खत्म कर अवैध निर्माण किए जा रहे हैं। इसके अलावा घरों की निकली नालियों का गंदा पानी भी तालाब में पहुंचता है जिस वजह से प्रदूषण का स्तर चिंताजनक हो रहा है। ऐसे में परिंदों को पर्याप्त मात्रा में जलीय जींव भोजन के लिए उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।




