भोपाल। बैंकिंग साख को बट्टा लगाने वाले मिसरोद शाखा भ्रष्टाचार मामले में सीबीआई कोर्ट ने कड़ा फैसला सुनाया है। विशेष न्यायाधीश नीलम शुक्ला की अदालत ने तत्कालीन शाखा प्रबंधक पियूष चतुर्वेदी और उनके साथी मोहनसिंह सोलंकी को दोषी करार देते हुए 7-7 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है।
फर्जी दस्तावेजों से निकाला जनता का पैसा
यह मामला साल 2014 का है, जब बैंक ऑफ इंडिया की मिसरोद शाखा में पदस्थ रहते हुए पियूष चतुर्वेदी ने मिलीभगत कर फर्जी दस्तावेजों के जरिए कई लोन मंजूर किए थे। जांच में खुलासा हुआ कि:
- विजन कंप्यूटर के नाम पर 12.50 लाख रुपये का फर्जी लोन पास किया गया।
- असली खाताधारकों को कानों-कान खबर नहीं हुई और पैसा अन्य फर्मों के खातों में ट्रांसफर कर दिया गया।
- साल 2016 में सीबीआई (ACB) को शिकायत मिलने के बाद इस बड़े घोटाले की परतें खुलीं।
कोर्ट ने बढ़ाईं धाराएं, लगा भारी जुर्माना
सीबीआई ने शुरुआती चार्जशीट में धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार की धाराएं लगाई थीं, लेकिन सुनवाई के दौरान पुख्ता सबूतों को देखते हुए अदालत ने जालसाजी (धारा 467, 468, 471) की गंभीर धाराएं भी जोड़ दीं।
सजा का विवरण:
- जालसाजी (467): दोनों को 7-7 साल की जेल।
- धोखाधड़ी व अन्य: अलग-अलग धाराओं में 5-5 साल की जेल।
- भ्रष्टाचार अधिनियम: पूर्व मैनेजर पियूष को भ्रष्टाचार की धाराओं में अलग से 5 साल की जेल और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई है।
अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए साफ किया कि बैंक जैसे भरोसेमंद संस्थान में जनता के पैसे से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जुर्माने की राशि जमा न करने पर दोषियों को अतिरिक्त जेल काटनी होगी।




