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​हिसाब की धमकी और मंच से ललकार, क्या नेताओं की जागीर है पुलिस?, सियासी गुरूर बनाम खाकी का फर्ज

दतिया उपचुनाव की बिसात बिछने से पहले ही शहर की कानून-व्यवस्था राजनेताओं के अहंकार के निशाने पर आ गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद दतिया में जो सियासी बवाल मचा, उसने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब कोई पुलिस अधिकारी अपना काम ईमानदारी से करता है, तो वह नेताओं की आंखों की किरकिरी बन जाता है। टिकट कटने से नाराज नरोत्तम समर्थकों ने सड़कों पर चक्काजाम कर दिया। हद तो तब हो गई जब समर्थकों ने मुख्यमंत्री के खिलाफ भी अपशब्दों का प्रयोग किया। शहर का माहौल बिगड़ता देख दतिया के पुलिस अधीक्षक (एसपी) मयूर खंडेलवाल ने मोर्चा संभाला और उपद्रवियों पर आंसू गैस के गोले छोड़कर पुलिस की सख्ती का अहसास कराया। लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने की यह कार्रवाई नेताओं को रास नहीं आई।

मंच से पूर्व गृह मंत्री की चेतावनी

अपने समर्थकों पर पुलिस के एक्शन से बौखलाए पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने खुलेआम मंच से एसपी मयूर खंडेलवाल को धमका दिया। अपनी चिर-परिचित नेतागिरी की भाषा में उन्होंने एसपी को निशाने पर लिया। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह वही घमंडी रवैया है, जिसे जनता पहले ही नकार चुकी है और जिसके चलते उन्हें पिछला चुनाव हारना पड़ा था। बड़ा सवाल यह है कि अगर शहर का एसपी दंगा और चक्काजाम न रोके, तो आखिर क्या करे?

पटवारी भी पीछे नहीं, बोले- चुनाव बाद में लडूंगा पहले हिसाब करूंगा
इस बहती गंगा में हाथ धोने से कांग्रेस भी पीछे नहीं रही। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी पुलिस को सीधी चेतावनी दे डाली। उन्होंने कहा, “मेरे कार्यकर्ताओं को अगर पुलिस ने परेशान किया, तो चुनाव बाद में लड़ूंगा, पहले आकर यहां हिसाब करूंगा।” सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों ही दलों के नेताओं ने पुलिस प्रशासन को अपने दबाव में लेने की खुली कोशिश की है।

कौन हैं एसपी मयूर खंडेलवाल ?

मंचों से धमकियां सुनने वाले मयूर खंडेलवाल कोई राजनेताओं के बनाए हुए मोहरे नहीं हैं। यह वो युवा हैं जिन्होंने अपनी रातें काली करके देश की सबसे कठिन यूपीएससी (UPSC) परीक्षा पास की है। एक आईपीएस (IPS) अधिकारी के रूप में उनका सपना जनता की सेवा करना और कानून का राज स्थापित करना है। एसपी मयूर खंडेलवाल ने दतिया में वही किया जो एक जिले के कप्तान का फर्ज है जनता की सुरक्षा।

अब चुनाव के बाद तय होगी कीमत?
लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन करने की कीमत एक ईमानदार एसपी को कितनी चुकानी पड़ेगी, यह दतिया चुनाव के बाद स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन इस घटना ने सिस्टम पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या पुलिस का काम सिर्फ नेताओं की जी-हुजूरी करना रह गया है? जब कोई अफसर संविधान की शपथ निभाता है, तो उसे धमकियां क्यों मिलती हैं?

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