भोपाल: राजधानी के बहुचर्चित टीला जमालपुरा फायरिंग और गैंगवार मामले में भोपाल पुलिस को अदालत में बड़ा झटका लगा है। जिला अदालत ने साक्ष्यों की कमी और कमजोर पैरवी के कारण कुख्यात गैंगस्टर जुबेर मौलाना और उसके चार साथियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। यह फैसला पुलिस की जांच और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े करता है।
क्या था पूरा मामला?
पुलिस के मुताबिक, 6 मई 2025 को तड़के टीला जमालपुरा के इंद्रानगर में जुबेर मौलाना अपने साथियों (शरीफ, फैसल, सन्नी और जहीर) के साथ हथियारों से लैस होकर पहुंचा था। आरोप था कि इलाके में खौफ फैलाने के लिए हवाई फायरिंग की गई और एक युवक पर जानलेवा हमला हुआ। इसके बाद हत्या के प्रयास का मामला दर्ज कर आरोपियों को जेल भेज दिया गया था, जहां उन्होंने करीब 440 दिन गुजारे।
अदालत में क्यों फेल हुई पुलिस?
डेढ़ साल चले इस मुकदमे में पुलिस की थ्योरी बुरी तरह फ्लॉप साबित हुई। इसके मुख्य कारण रहे:
- गवाहों का मुकरना: फरियादी, घायल युवक और मौके पर मौजूद सभी चश्मदीद गवाह अदालत में अपने पुलिस को दिए बयानों से पलट गए।
- अधूरी जांच: पुलिस यह साबित ही नहीं कर पाई कि आखिर वारदात में गोली किस हथियार से और किसने चलाई थी।
- कमजोर जब्ती: जुबेर और उसके साथियों से पिस्टल, तलवार और चाकू जब्त होने का दावा किया गया था, लेकिन जब्ती के स्वतंत्र गवाहों ने भी कोर्ट में पुलिस का समर्थन करने से इनकार कर दिया।
पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल
एक वरिष्ठ पत्रकार के नजरिए से देखें तो इतनी गंभीर धाराओं वाले केस का यूं अदालत में ढह जाना चिंताजनक है। यह मामले की जांच में हुई लापरवाही को उजागर करता है: - अगर फायरिंग हुई थी, तो बैलिस्टिक रिपोर्ट या अन्य सबूतों से पुलिस यह क्यों नहीं बता पाई कि गोली किसने चलाई?
- इतने अहम गवाह आखिर क्यों मुकर गए? क्या गवाहों की सुरक्षा को लेकर पुलिस ने कोई कदम नहीं उठाए थे?
- क्या चालान पेश करने से पहले सबूतों का कोई कानूनी परीक्षण नहीं किया गया?
आगे क्या?
आरोपियों के बरी होने के बाद अब सभी की नजरें भोपाल पुलिस कमिश्नरेट पर हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पुलिस मुख्यालय इस लचर जांच की कोई आंतरिक समीक्षा करेगा, ताकि भविष्य में तकनीकी खामियों और कमजोर जांच का फायदा उठाकर अपराधी यूं आसानी से न छूट सकें।




