अपराधियों को पकड़ने वाले खुद दिल चुराने में बिजी मिले
राजधानी के पुलिस महकमे में इन दिनों एक ही गॉसिप चल रही है, और वो है अरेरा हिल्स थाने की रंगीन कहानी। पुलिस का काम लोगों को सुरक्षा देना है, लेकिन हमारे टीआई सुनील शर्मा जी तो ड्यूटी के साथ-साथ क्राइम पेट्रोल का अपना अलग ही एपिसोड शूट कर रहे थे। नतीजा? पुलिस कमिश्नर ने टीआई साहब और उनके खास सिपहसालार, आरक्षक नंदकिशोर का बोरिया-बिस्तर गोल कर उन्हें सस्पेंड कर दिया है।
आखिर माजरा क्या है?
हुआ यूं कि एक परेशान पति ने सीधे पुलिस कमिश्नर के दरबार में हाजिरी लगाई। बेचारे ने जो कहानी सुनाई, उसे सुनकर आला अफसरों के भी कान खड़े हो गए। शिकायत थी कि टीआई साहब कानून की धाराओं के बजाय उनकी पत्नी से इश्क फरमाने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे थे। और तो और, इस पूरे लव ट्रायंगल में उन्होंने अपनी खाकी वर्दी और कुर्सी के रुतबे का फुल इस्तेमाल किया।
सिपाही जी बने साइड हीरो
हर ब्लॉकबस्टर फिल्म की तरह इस कहानी में भी एक साइड-हीरो था आरक्षक नंदकिशोर। सिपाही जी को अपने बॉस के इस अंडरकवर लव ऑपरेशन की पूरी भनक थी। आरोप है कि बॉस को खुश करने के चक्कर में उन्होंने भी महिला पर दबाव बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मतलब, हम तो डूबेंगे साहब, तुम्हें भी ले डूबेंगे वाली कहावत यहां एकदम सच साबित हुई।
कमिश्नर साहब का चला डंडा
शिकायतकर्ता पति खाली हाथ नहीं गया था, वो साथ में पक्के सबूत भी ले गया था। डीसीपी विकास सहवाल जी ने भी शुरुआती जांच में पाया कि दाल में काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। बस फिर क्या था, कमिश्नर साहब ने बिना देर किए दोनों का बैंड बाजा बारात निकाल दिया और तत्काल प्रभाव से सस्पेंशन का लेटर थमा दिया।
अब आगे क्या?
अब मामले में विभागीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं। फाइलें खुलेंगी और यह देखा जाएगा कि साहब ने वर्दी की धौंस जमाकर और कितने गुल खिलाए हैं। फिलहाल, शहर भर के चौराहों, थानों और चाय की गुमटियों पर बस यही कानाफूसी है कि जब शहर के रक्षक ही ऐसे आशिक मिजाज निकलेंगे, तो आम आदमी अपनी फरियाद लेकर कहां जाएगा? खैर, विभागीय जांच की रिपोर्ट जो भी आए, लेकिन टीआई साहब की इस क्राइम एंड लव स्टोरी का द एंड बहुत ही फ्लॉप रहा।
डिस्क्लेमर: यह कॉलम/लेख जनश्रुतियों (सुनी-सुनाई बातों) और सूत्रों से मिली प्रारंभिक जानकारी पर आधारित है। इसे व्यंग्यात्मक शैली में केवल पाठकों की रुचि के लिए लिखा गया है। हमारा उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, संस्था, पुलिस विभाग या प्रशासनिक अधिकारी की छवि धूमिल करना या भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। विभागीय जांच और कानूनी मामलों में अंतिम सत्यता के लिए आधिकारिक बयानों को ही प्रामाणिक माना जाए।



