Sunday, July 12, 2026
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बावड़ी खुदाई में निकली भगवान विष्णु की मूर्ति

बूढ़ी बरसत गांव में हनुमान मंदिर स्थित बावड़ी की खुदाई के 29वें दिन भगवान विष्णु की प्रतिमा निकली, जो काफी प्राचीन है। शेष सइया पर विष्णु भगवान विराजमान हैं, तो नाभि से कमल के फूल पर ब्रह्माजी विराजमान हैं। चरणों में लक्ष्‌मी माता चरण दबा रही हैं। कुछ ऐसी तमाम आकृतियां हैं। इधर, ग्रामीणों को जैसे ही खुदाई में मूर्ति निकलने की जानकारी लगी, तो बावड़ी पर तांता लग गया। इंटरनेट मीडिया पर उक्त मूर्ति को वायरल किया जाने लगा। पीपलखेड़ी से पश्चिम की ओर तीन किमी दूर बूढी बरसत है। सैकड़ों वर्ष पहले बरसत गांव उसी जगह पर बसा हुआ था, लेकिन उस समय महामारी से बचने पूर्वजों ने उस स्थान को छोड़कर नया गांव बसाया, जो आज बरसत के नाम से जाना जाता है। लेकिन बरसत के लोगों ने उस ऐतिहासिक स्थान पर जाना नहीं छोड़ा। यहां प्राचीन हनुमानजी मंदिर का चबूतरा पहले का बना हुआ था, लेकिन बरसत के ग्रामीणों ने अब उस स्थान पर चबूतरा की जगह मंदिर का निर्माण करवा दिया है। लेकिन हनुमानजी की मूर्ति उस मंदिर में अभी भी विराजमान है। यहां बावड़ी भी बनी हुई थी, जो पुर चुकी थी। ग्रामीणों ने मंदिर के पुजारी व भगवान की पूजा एवं लोगों को पानी पीने की परेशानी ना हो इसलिए बावड़ी की खुदाई करते हुए आज 29वें दिन खुदाई के दौरान भगवान विष्णु की प्रतिमा निकली। मंदिर के पुजारी कमलेश पारीक ने बताया कि लोग खुदाई कर रहे थे कि अचानक खुदाई करते समय बावड़ी के बीचोंबीच कुछ विचित्र पत्थर दिखाई दिया, तो उसको धीरे-धीरे खोदा गया।ऊपर की तरफ उठाया, तो मूर्ति दिखाई दी। खुदाई करने वालों ने मूर्ति को बावड़ी में रख दिया गया था। विष्णु भगवान की मूर्ति काफी पुरानी दिखाई दे रही है। शेष सईया पर विष्णु भगवान विराजमान हैं। नाभि से कमल के फूल पर ब्रह्माजी विराजमान हैं। चरणों की तरफ लक्ष्‌मी मैया उनके चरण दबा रही हैं और कुछ छोटी-छोटी आकृतियां बनी हुई हैं, जिसमें हनुमानजी महाराज का चित्र है और बहुत से देवताओं के चित्र बने हुए हैं। गांव के सरपंच राजेंद्र मीना एवं डॉ. रमेशचंद्र सोनी और वरिष्ठजन को इसकी जानकारी दी गई, तो कुछ देर बाद ही गांव के सरपंच और डॉ. रमेशचंद्र सोनी बावड़ी पर पंहुचे और मूर्ति को निकलवाकर हनुमानजी मंदिर पर रखा गया। जैसे ही आसपास के लोगों ने इस खबर को सुना, तो लोगों का मूर्ति दर्शन के लिए तांता लग गया।

बुजुर्ग बताते थे कि यहां एक बहुत बड़ा मठ बना हुआ था। मैंने बचपन में एक चबूतरे के अवशेष भी देखे थे। इसे मठवाला खेत भी कहते थे, लेकिन ये बात दशकों पुरानी है।

– ठा. शिशुपाल सिंह, 80 वर्षीय किसान

मैंने खजुराहो व कोणार्क मंदिरों की मूर्ति कला को करीब से देखा है। यह मूर्तियां भी उन्हीं के जैसी दिख रहीं हैं, जिससे इनकी उम्र भी लगभग डेढ़ हजार वर्ष पूर्व की प्रतीत होती है।

कप्तानसिंह यादव, रिटायर्ड अध्यापक

बुजुर्ग कहते थे कि पूर्व में यहां खेरा था, जिसे मुगलकालीन शासकों ने तोप से ढहा दिया था। यह भी हो सकता है कि ये मूर्तियां किसी मंदिर या किसी स्थापत्य में समाहित रही हों और जमींदोज हो गई हों।

– रामवीरसिंह गांधी, किसान

जिले में पहले भी इस तरह की मूर्तियां निकली हैं, जो संग्रहालय में सुरक्षित रखी हैं। यह जैन, बुद्ध तथा हिंदू धर्म से संबंधित रही हैं, जिनका इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है। जरूरी है कि प्रशासन इन्हें भी संग्रहालय भिजवाए।

– प्रो. अली अतहर, चेयरमैन इतिहास विभाग

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