भोपाल। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की अमेरिका और इजराइल के हमले में मौत की खबर के बाद राजधानी भोपाल समेत देशभर के शिया समुदाय में गम का माहौल है। रविवार को भोपाल के करोंद स्थित मस्जिद मोहम्मदी में जोहर की नमाज के बाद एक बड़ी श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई, जिसमें सैकड़ों की संख्या में लोग शामिल हुए।
‘जुल्म के खिलाफ आवाज थे खामेनेई’
सभा को संबोधित करते हुए इमाम बाकर हुसैन ने कहा कि खामेनेई ने जीवनभर मजलूमों का साथ दिया और अत्याचार का डटकर विरोध किया। उन्होंने कहा, “इतिहास गवाह है कि किसी शख्सियत के जाने से विचारधारा खत्म नहीं होती। इंकलाब की राह पर चलने वाले लोग हमेशा मौजूद रहेंगे।”
वहीं, इमाम जुमा सैयद अजहर हुसैन रिजवी ने उन्हें ‘निडर रहबर’ बताते हुए कहा कि खामेनेई ने कभी फिरके (संप्रदाय) के आधार पर भेदभाव नहीं किया, बल्कि इंसानियत के नाते हर उस शख्स की आवाज बने जिस पर जुल्म हुआ।


नारेबाजी और विरोध
श्रद्धांजलि सभा के दौरान मस्जिद परिसर में भारी आक्रोश भी देखा गया। मौजूद लोगों ने अमेरिका और इजराइल के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। सभा में ‘इजराइल मुर्दाबाद’, ‘अल्लाह-हू-अकबर’ और ‘खामेनेई जिंदाबाद’ के नारे गूंजते रहे।
खामेनेई का सफर: क्रांति से सत्ता के शिखर तक
- क्रांति के नायक: 1979 की इस्लामिक क्रांति में खामेनेई ने अहम भूमिका निभाई थी।
- लंबा कार्यकाल: 1981 से 1989 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे और फिर रुहोल्लाह खुमैनी के बाद सर्वोच्च नेता (सुप्रीम लीडर) बने।
- धार्मिक पद: ईरान के कानून के अनुसार सुप्रीम लीडर बनने के लिए ‘अयातुल्ला’ (उच्च धार्मिक पदवी) होना अनिवार्य है।
तनाव की पृष्ठभूमि
ईरान और इजराइल-अमेरिका के बीच विवाद की जड़ें पुरानी हैं। परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण और मिडिल ईस्ट में बढ़ते प्रभाव को लेकर अमेरिका ने ईरान पर कई कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हुए हैं, जिसका खामेनेई हमेशा विरोध करते रहे।




