राजधानी भोपाल में कमिश्नर प्रणाली लागू है। सड़कों पर पुलिस का भारी लाव-लश्कर भी नजर आता है, लेकिन जब बात अपराध नियंत्रण की आती है, तो नतीजे सिफर ही नजर आते हैं। शहर में चोरी और झपटमारी की घटनाएं उफान पर हैं और नशे के सौदागर सुकून की नींद सो रहे हैं। नए पुलिस कमिश्नर साहब से भोपाल की जनता को जो उम्मीदें थीं, वे अब टूटती नजर आ रही हैं।
भाषण सिंघम वाले, पर नतीजे फुस्स
जनता ने नए कमिश्नर साहब से बड़ी उम्मीदें लगाई थीं। साहब की बातें सुनकर तो अच्छे-अच्छों को पसीना आ जाए, लेकिन जमीन पर इन धांसू बातों का कोई असर नहीं दिख रहा है। ऐशबाग इलाके में हुए सनसनीखेज पति-पत्नी हत्याकांड को ही ले लीजिए। कई दिन बीत गए, लेकिन पुलिस के हाथ अब तक खाली हैं। लगता है कातिल भी वारदात के बाद हेलमेट पहनकर भागे होंगे।
पुराने दबंग अधिकारी बनाम नए साहब
भोपाल के प्रशासनिक और पुलिस महकमे की एक पुरानी रवायत है— यहाँ हर अफसर अपने काम के हिसाब से उपाधि लेकर जाता है।
संतोष सिंह (पूर्व डीआईजी): जनता आज भी इन्हें याद करती है। इन्होंने जेबकतरों की ऐसी क्लास लगाई थी कि भोपाल के कई जेबकतरे अपना पेशा भूलकर ईमानदारी से पकौड़े तलने लगे थे।
हरिनारायण चारी मिश्र (पूर्व कमिश्नर): इनका कार्यकाल भी शानदार माना जाता है। इनके समय में भोपाल के अपराधों में 8% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी।
तालियां बजाइए, आ गए हेलमेट कमिश्नर
पुराने दिग्गजों के काम को देखते हुए लगता है कि हमारे नए कमिश्नर साहब भी अपना एक टैग फिक्स करवा कर ही मानेंगे। शहर में चर्चा है कि उन्हें हेलमेट कमिश्नर की उपाधि से नवाजा जा सकता है । आजकल भोपाल की पुलिस को अपराधियों को पकड़ने में कोई खास दिलचस्पी नहीं है। उनका बस एक ही ‘महा-टास्क’ है— मुजरिम भागे तो भागे, पर बिना हेलमेट वाला चाचा दूध लेकर घर नहीं पहुंचना चाहिए।
साहब के लिए एक फ्री सलाह
कमिश्नर साहब को चाहिए कि वो अपनी चालान वाली डायरी थोड़ी देर के लिए बंद करें और पुराने दबंग अफसरों (संतोष सिंह और हरिनारायण चारी मिश्र) की कार्यप्रणाली से थोड़ा ट्यूशन ले लें। उन अफसरों ने हर सिचुएशन का निडरता से सामना किया और बड़े-बड़े क्रिमिनल्स को हवालात की हवा खिलाई।
वक्त की मांग है कि पुलिस चालान काटने के खुमार से बाहर निकले। हेलमेट सिर बचाता है साहब, लेकिन कानून-व्यवस्था पूरे शहर को बचाती है!



