राजधानी के खाकी महकमे में इन दिनों बस कोहेफिजा थाने की कलेक्शन डायरी के ही चर्चे हैं। पुलिस महकमे के गलियारों में जोरों से कानाफूसी चल रही है कि जब थाने का एक सिपाही ही खुद को थानेदार समझ बैठे और अफसरों को खबर तक न हो, तो इसे सिस्टम की नाकामी कहें या मिलीभगत।
एक कान से सुना, दूसरे से उड़ाया
किस्सा एसीपी स्तर के आला अधिकारियों की गहरी नींद से जुड़ा है। कहते हैं न कि ‘चिराग तले अंधेरा। सूत्र बताते हैं कि 6 महीने पहले ही एसीपी अनिल बाजपेई जी के कान में किसी ने फूंका था कि आपका आरक्षक आकाश इलाके के गुंडे-बदमाशों से टैक्स और शराब की बोतलें वसूल रहा है। लेकिन साहब ठहरे साहब। उन्होंने एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया। महकमे में चुटकी ली जा रही है कि हमारे वरिष्ठ अधिकारियों को थाने का सच तब तक दिखाई नहीं देता, जब तक कि कोई पत्रकार उनके चश्मे का नंबर न बदल दे। जब अखबार ने नाम के साथ वसूली का पूरा काला चिट्ठा छाप दिया, तब जाकर साहबों की कुंभकर्णी नींद टूटी है।
सिपाही का स्वैग और बलि का बकरा
थाने में आरक्षक आकाश के रुतबे के क्या कहने! भइया का एटीट्यूड ऐसा था कि असली थाना प्रभारी भी शर्मा जाएं। गुंडों से वसूली करने वाला यह सुपरकॉप अब खुद जांच की आंच में झुलस रहा है। लेकिन, कहानी में एक और ट्विस्ट है। थाने के अंदरखाने से छनकर आ रही खबरों की मानें, तो इस पूरे मलाई-कांड में आरक्षक आलीशान को तो महज़ बलि का बकरा बनाया जा रहा है। असली खिलाड़ियों और पर्दे के पीछे छिपे चेहरों को बचाने की तगड़ी सेटिंग चल रही है।
निलंबन का दिखावा या असली सफाई?
फिलहाल डैमेज कंट्रोल के लिए डीसीपी साहब (आयुष गुप्ता) ने टू-आईसी के. शुक्ला जी पर गाज गिराते हुए उन्हें सस्पेंड कर दिया है। लेकिन कानाफूसी तो यह भी है कि क्या यह कार्रवाई सिर्फ अखबारों की सुर्खियों को शांत करने का एक अस्थायी ‘ड्रामा’ है? क्या कभी उन अफसरों से भी जवाब-तलब होगा जो इतने लंबे समय तक आंखें मूंदकर इस वसूली आश्रम को फलने-फूलने दे रहे थे?
खैर, खाकी के इस ‘सिस्टम’ में कब कौन किसका मोहरा बन जाए, कोई नहीं जानता। अब देखना यह है कि जांच की यह फाइल भी कुछ दिनों बाद धूल खाती है या वाकई कोई बड़ा पर्दाफाश होता है ।
नोट:- डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह समाचार/लेख सूत्रों से प्राप्त जानकारी, पुलिस महकमे के भीतर चल रही चर्चाओं (कानाफूसी) और पूर्व में प्रकाशित मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। इस लेख का प्राथमिक उद्देश्य जनहित में सूचना देना है, न कि किसी भी व्यक्ति, अधिकारी, पुलिस विभाग या संस्था की छवि को धूमिल करना अथवा मानहानि करना।लेख में उल्लिखित अधिकारियों और कर्मचारियों पर लगे आरोप वर्तमान में विभागीय जांच का विषय हैं। हमारा समाचार संस्थान/लेखक इन आरोपों और दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है। जब तक सक्षम प्राधिकारी या माननीय न्यायालय द्वारा जांच पूर्ण कर कोई अंतिम निर्णय नहीं सुना दिया जाता, तब तक कानूनी रूप से किसी को भी दोषी नहीं माना जा सकता।



