उर्दू शायरी को आम आदमी की ज़ुबान देने वाले अज़ीम शायर डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 91 वर्ष की उम्र में उन्होंने इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह दिया। वह पिछले करीब 14 साल से ‘डिमेंशिया’ (भूलने की बीमारी) से पीड़ित थे। कल शाम भोपाल में उन्हें सुपुर्दे-खाक किया गया। उनके जाने से अदबी दुनिया में जो खालीपन आया है, उसे कभी भरा नहीं जा सकेगा।
सड़क से संसद तक गूंजे जिसके शेर
बशीर बद्र साहब की शायरी सिर्फ किताबों या मुशायरों तक महदूद नहीं थी। अरबी-फ़ारसी के भारी-भरकम शब्दों से दूर, उन्होंने बेहद आसान लफ़्ज़ों में ज़िंदगी के फलसफे को पिरोया। उनका यह शेर देश की संसद से लेकर अदालतों और आम गलियों में आज भी सबसे बड़ा सहारा बनता है:
“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।”
शिमला समझौते से मेरठ दंगों के दर्द तक
15 फरवरी 1935 को अयोध्या में जन्मे बशीर बद्र का जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहा। शिमला समझौते के वक्त उनका एक शेर सरहदों के पार तक गूंजा और दोनों मुल्कों को आईना दिखा गया:
“दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।”
1987 के मेरठ दंगों में उनका घर जला दिया गया था। इस गहरे दर्द ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया, जिसके बाद उन्होंने भोपाल को अपना नया मस्कन (घर) बना लिया। इस त्रासदी को उन्होंने इन शब्दों में बयां किया था, जो आज भी मजहबी नफरत फैलाने वालों पर करारा तमाचा है:
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।”
पुलिस की नौकरी छोड़ी, पढ़ाई में रहे अव्वल
बचपन में पिता के साए से महरूम होने के बाद उन्होंने मजबूरी में पुलिस की नौकरी की, लेकिन शायरी का जुनून उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ले आया। वह वहां के गोल्ड मेडलिस्ट रहे। दिलचस्प बात यह है कि जब वह एमए की पढ़ाई कर रहे थे, तब उनके खुद के शेर पाठ्यक्रम का हिस्सा थे।
मीना कुमारी द्वारा डायरी में लिखे जाने के बाद मशहूर हुआ उनका यह शेर आज उनकी विदाई पर हर आंख को नम कर रहा है:
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
बद्र साहब भले ही जिस्मानी तौर पर चले गए हैं, लेकिन अपनी शायरी के उजाले वह हमेशा के लिए हमारे साथ छोड़ गए हैं।



