भोपाल:
बच्चों के भोजन और पोषण के अधिकार को लेकर शाहपुरा स्थित आइकफ (ICIF) आश्रम में चल रहे तीसरे राष्ट्रीय अधिवेशन का रविवार को समापन हो गया। 17 राज्यों से आए करीब 400 प्रतिनिधियों ने इस दौरान भोजन और पोषण के गंभीर मुद्दों पर मंथन किया और कहा कि ये विषय आज भी मुख्यधारा के विमर्श से दूर हैं।
समापन से पहले मनीषा मार्केट से बिट्टन मार्केट तक एक विशेष पदयात्रा निकाली गई, जिसमें बच्चों के अधिकारों की आवाज बुलंद की गई। तीन दिनों की चर्चा के आधार पर एक मांगपत्र तैयार किया गया है, जिसे नीति निर्धारकों को भेजा जाएगा।
प्रमुख बिंदु और चर्चाएं:
- बालाघाट घटना और पोषण संकट: मीडियाकर्मी बिंदू ने बालाघाट की घटना का जिक्र करते हुए इसे लंबे समय से चले आ रहे पोषण संकट का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदायों का जंगल से रिश्ता कमजोर होने से वे सरकारी योजनाओं पर निर्भर हो गए हैं, जिसका असर उनके पोषण पर पड़ रहा है।
- मीडिया की भूमिका: पत्रकार रोहिण कुमार ने कहा कि वंचित समुदायों और पोषण के मुद्दों पर संवेदनशील रिपोर्टिंग बहुत जरूरी है, हालांकि चुनौतियों के कारण ऐसी खबरें कम ही सामने आ पाती हैं।
- टेलीविजन बहसों से मुद्दे गायब: राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने जनप्रतिनिधि सत्र में कहा कि पिछले 14-15 वर्षों से देश में बुनियादी मुद्दे टेलीविजन बहसों से गायब हैं। उन्होंने खाद्यान्न उत्पादन बढ़ने के बावजूद पोषण की स्थिति पर गहरी चिंता जताई।
- पंचायतों और आंगनवाड़ियों की समस्याएं: उत्तर प्रदेश के एक सरपंच ने बताया कि पर्याप्त अधिकार न होने के कारण स्कूलों में शिक्षकों की जवाबदेही तय करना कठिन है। वहीं, गुजरात से आईं सायरा बानो ने बताया कि किराए के भवनों में चलने वाली अनियमित आंगनवाड़ियों का बुरा असर बच्चों के पोषण पर पड़ रहा है।
- कारगर क्रियान्वयन पर जोर: समानांतर सत्रों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मातृ-बाल पोषण और रोजगार पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने माना कि योजनाओं की सफलता के लिए केवल बजट नहीं, बल्कि प्रभावी क्रियान्वयन और समुदाय की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है।




