भोपाल। लगता है इंदौर क्राइम ब्रांच वालों ने आजकल पहले एक्शन, फिर रिएक्शन वाली तर्ज पर नया नियम बना लिया है- पहले FIR ठोको, सबूत तो बाद में गूगल कर लेंगे। जी हां, एक खबर छापने की गुस्ताखी क्या कर दी, पत्रकार प्रवेश गौतम के खिलाफ रातों-रात एफआईआर का प्रसाद बांट दिया गया।
अब पुलिस की इस सुपरफास्ट एकतरफा कार्रवाई को देखकर रॉयल प्रेस क्लब का भी माथा ठनक गया। क्लब ने आव देखा न ताव, सीधे मध्य प्रदेश के पुलिस मुखिया (DGP) का दरवाजा खटखटा दिया।
क्लब के अध्यक्ष पंकज भदौरिया ने अपनी शिकायत में पुलिस के जासूसी कौशल पर सवाल उठाते हुए कहा है कि बिना किसी शुरुआती जांच-पड़ताल और ठोस सबूत के सीधे एफआईआर दर्ज कर लेना, वाकई गजब का टैलेंट है। प्रेस क्लब का कहना है कि यह तो पत्रकारों के अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी पर पुलिसिया सर्जिकल स्ट्राइक है।
रॉयल प्रेस क्लब ने डीजीपी साहब से गुहार लगाई है कि कृपया इस मामले में निष्पक्ष जांच वाला चश्मा पहनकर देखें और फिलहाल इस एफआईआर एक्सप्रेस पर तुरंत ब्रेक लगाएं।
जाते-जाते क्लब ने एक करारी बात भी कह दी है- अगर जांच में पता चला कि पत्रकार पर लगाए गए आरोप उतने ही झूठे हैं जितने अक्सर चुनावी वादे होते हैं, तो फर्जी शिकायत करने वालों की भी पुलिस स्टेशन में बकायदा कानूनी खातिरदारी होनी चाहिए ।
एक पत्रकार के नजरिए से जब हम प्रवेश गौतम के खिलाफ हुई एफआईआर की घटना को देखते हैं, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की स्वतंत्रता से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न बन जाता है।



